12 जनवरी, 2016

अंतर्मन

 

 हलकी सी आहट गलियारे में
कहाँ से आई किस लिए
 किस कारण से
लगा समापन हो गया
निशा काल का
तिमिर तो कहीं न था
स्वच्छ नीला  आसमान सा 
दृष्टि पटल पर छाया
तनाव रहित जीवन में
 यह किसने सर उठाया
द्वार के कपाट खुले
दर्द का अहसास जगा
धीमी न थी गति  उसकी
पूरी क्षमता से किया प्रहार
तन की सीमा पार कर गई
मन पर भी हावी हुई
सूनी सूनी आँखों से
 देदी विदाई
वरण मृत्यु का करने को
मार्ग बड़ा ही अद्भुद था
आलौकिक नव रंगों से
वर्णन करना है कठिन
वहां तक पहुँच तो न पाए
पर अंतर मन जान गया
भय के लिए स्थान नहीं
इस जग में या उस जग में
ना कहीं माया दिखी
न मोह ने घेरा
सब कुछ  नया सा था
बंद आँखों से दृश्य
कहीं गुम हो गया
था छद्म रूप वह
जन्म मृत्यु  या मोक्ष का
 या था प्रत्यक्ष या परोक्ष
 मन में उठे सवालों का
भय ने हलकी सी
 जुम्बिश तक न दी थी
निरीह दृष्टि तक न उठी थी
आसपास खड़े अपनों  तक
मन में कोई हलचल न थी
ना ही कोई सोच उभरा
पर अब लगा
हलचल न हुई तो क्या हुआ
 शायद मृत्यु  द्वार का पहुँच मार्ग
अंतर मन देख पाया |
आशा










09 जनवरी, 2016

शिक्षक से

माँ हमारी प्रथम गुरू 
उनके बाद आप ही हो 
जिसने वादा निभाया 
हमें इस मुकाम तक पहुचाया 
आज हम जो भी हैं 
आपके कारण बने हैं 
तभी तो दिल से ऋणी हैं 
ऋण कैसे चुकाएं 
नहीं जानते पर आपके 
पद चिन्हों पर चलते 
आपका उपकार मानते |
आशा

26 दिसंबर, 2015

लम्बी सड़क सा जीवन



प्रातः काल सुनहरी धूप
लम्बी सड़क दूर तक 
दे रही कुछ सीख 
तनिक सोच कर देखो |
आच्छादित वह   दीखती
हरेभरे कतारबद्ध वृक्षों से
बनती मिटती छयाओं से
उनके अद्भुद आकारों से |
बाल सूर्य की किरणे अनूप
छनछन कर आती धूप
वृक्षों की टहनियों को छू कर
करती आल्हादित तन मन |
निमंत्रित करतीं वहां आने को
मन बावरे को सवारने  को 
एक खिचाव सा होता 
अजीब लगाव सा होता |
फिर से पहुँच जाती
 कल्पना जगत में 
खो जाती सुरम्य वादी की
 उन रंगीनियों में |
कभी लम्बी कभी छोटी
 छाया वृक्षों की  
देती संकेत
 विविधता पूर्ण  जीवन की |
कहीं ऊंची कहीं नीची सड़क
 दिखाती जिन्दगी में
आते उतार चढ़ावों   को  

जीवन के संघर्षों को  |
प्रकृति के कण कण से यहाँ
मिलती रहती   शिक्षा हर पल
इस क्षण को जी भर कर जी लो
कल की किसको खबर
आशा



24 दिसंबर, 2015

क्यूं हो उदास

सांता क्यूं हो उदास आज 
कुछ थके थके से हो 
है यह प्रभाव मौसम का 
या बढ़ती हुई उम्र का
अरे तुम्हारा थैला भी 
पहले से छोटा है 
मंहगाई के आलम  में
 क्या उपहारों का टोटा है
मनोभाव भी यहाँ 
लोगों के बदलने लगे हैं 
प्रेम प्यार दुलार सभी
धन से तुलने लगे हैं
मंहगाई का है यह प्रभाव 
या हुआ आस्था का अभाव 
न जाने कितने सवाल 
मन में उठने लगे हैं
कहाँ गया वह प्रेमभाव 
क्यूं बढ़ने लगा है अलगाव 
भाई भाई से दूर हो रहे 
अपने आप में सिमटने लगे 
क्या तुम पर भी हुआ है वार 
आज पनपते अलगाव का 
या है केवल मन का भ्रम 
या है मंहगाई का प्रभाव 
पर मन बार बार कहता है 
हैप्पी क्रिसमस मेरी क्रिसमस
आज के इस दौर में
खुशियाँ बांटे मनाएं क्रिसमस
इस कठिनाई के दौर में
तुम आये यही बहुत है 
प्यारा सा तोहफा लाए 
मेरे लिए यही अमूल्य  है |
आशा

23 दिसंबर, 2015

मन्त्र कितना सार्थक

अकेलापन के लिए चित्र परिणाम
भीड़ तंत्र ने मन्त्र दिया
खुद को अकेला कर लिया
कीचड़ में खिला कमल सा
यही उसने नुस्का दिया |


भीड़ में खोना नहीं है
तुम्हें अकेले ही जाना है
कोई साथ नहीं देता
यही किस्सा पुराना है |

समय व्यर्थ गवाया पहले
यहाँ वहां जाने आने में
पर प्यार कहीं ना पाया
जो पाया तुम्हारे  सान्निध्य में  |

तुम्हारे कदमों की आहट
जब भी  होती है
मैं जान जाती हूँ
तुम्हें पहचान जाती हूँ |

आती बयार की महक से
होता  अहसास तुम्हारा
गहरी उदासी कहीं
गुम हो ही जाती है |

मन्त्र  अकेले रहने का
अब डगमगाने लगा है
मन का निर्णय है
तुम्हारे साथ चलूँ |

यही बेचैनी मुझे
कमजोर कर रही है
भीड़ में अकेले रहना
सरल नहीं है |

तुम  मेरा जीवन हो
तुम्ही हो सहारा
हर सांस में तुम्ही तुम  हो
यह अब मैंने जाना |

इस भीड़ तंत्र से बच कर
मेरे पास आना
दिल में जगह रखना
 बहाना न बनाना |

आशा



18 दिसंबर, 2015

मूल मन्त्र

फूल पर बैठा भ्रमर के लिए चित्र परिणाम

मन रे  तू है कितना भोला 
खुद में ही खोया रहता 
जग  में क्या कुछ हो रहा
उससे  कोई ना नाता रखता 
भ्रमर पुष्प पर मंडराता
गीत प्रेम के गाता
हर बार नया पुष्प होता 
दुनिया की रीत निभाता
तू भी गुनगुनाता है
उन गीतों को दोहराता है
खिले हुए पुष्पों से
क्या  कभी रहा तेरा नाता ?
अपना सुख दुःख
तूने किस किस से बांटा ?
यही कला ना सीखी 
तभी रहा सदा ही घाटा
जब किसी से सांझा करेगा
विचारों का मंथन करेगा
बोझ तेरा हल्का होगा
घुटन का अनुभव न होगा
अंतर्मुखी हो कर जीना भी
क्या कोई  जीना है
रहो बिंदास प्रसन्न वदन
है  मूल मन्त्र जीवंत जीवन का |