26 जून, 2013

कुछ अलग सा

इतने बड़े जहान  में
महफिलें सजी बहारों की
चहुओर चहलपहल रहती
उदासी कोसों दूर दीखती |
पर वह अकिंचन
मदमस्त मलय के प्रहार  से
 आहत एकल सिक्ता कण सा
बहुत असहज हो जाता |
चमक दमक देख कर
अवांछित तत्व सा
कौने में सिमटता जाता
अपना मन टटोलना चाहता  |
लगते न जाने क्यूं वहां
सभी रिश्ते आधे अधूरे
 सतही लगते
अपनेपन से दूर
 रोज बनते बिगड़ते |
बदले जाते कपड़ों से
दिखावे से ओतप्रोत होते
एक भी नहीं उतरता
 दिल की गहराई तक |
वह वहां दिखाई देता
मखमल में लगे
 टाट के पेबंद सा
दूर जाना चाहता
 उस अछूते कौने में
जो हो आडम्बर से परे
 भीड़ भाड़ से मुक्त
जहां कोइ अपना हो
टूट कर उसे चाहे
बाहें फैलाए खडा हो
उसे अपने में समेटने को
प्यार की भाषा समझे
छिपाले उसे अपने दिल में |

आशा